!! श्री कुंज बिहारी श्री हरिदास !!
अनेकोनेक कल्पो से तपस्या में लीन विश्वादि पंचन ऋषिवर नित्यविहार प्राप्ति हेतु तपस्या में लीन रहे। ऋषिवरो की एक भाव तत्पश्चर्या देख जब स्वयं श्री नारायण वरदान इनको वर देने आए तब विश्वादी ऋषियों ने नित्य विहार की प्राप्ति मांगी, लेकिन इस वरदान को पूर्ण करने में श्रीमन् नारायण भगवान ने अपनी असमर्थता प्रकट करी और कहा नित्य विहार से पृथक और कोई भी अन्य वर चाहिए तो में आप ऋषियों को प्रदान कर सकता हूँ। इतना सुनकर ऋषिगण बोले तो आप कृपा करके हमें यह वरदान प्रदान करें कि हम शरीर देह कितने भी धारण कर ले हमारी स्मृति कभी भूले नहीं। श्री नारायण भगवान एवमस्तु कह वरदान दे अंर्तध्यान हो गये। अनेको कल्प बीत गये विश्वादि पंचन ऋषि तपस्या में लीन रहे।सतयुग समाप्त हो गया – त्रेता युग समाप्त हो गया – द्वापर युग समाप्त हो गया – कलयुग काल में सन 1500 ईस्वी वाले दौर में, एक समय श्री नारद जी ने भगवान श्री कृष्ण को, अति गहन ध्यान लगाते हुए देख सचित हुए, और श्री कृष्ण ठाकुर जी से विनती की हे प्रभू! कि हे प्रभु -अब मुझसे नहीं रहा जाता, कृपा करें और विनती स्वीकार करें। हे प्रभु! समस्त तीनो लोक सृष्टि के रचयिता सहित ब्रहमा, विष्णु, महादेव समस्त ऋषिमुनी, समस्त वेद, समस्त शास्त्र आपको नमन करते है, तो आपसे परे इस संसार में कुछ है ही नहीं, लेकिन फिर भी आप….प्रभु आप.. फिर भी आप इतने तनमयन्ता से मग्न होकर किसका ध्यान कर रहे हों।यह जानने की अति व्याकुल जिज्ञासा हे, की जिनके अस्तित्व का कोई और छोर नही, वह स्वंय प्रभु किसका ध्यान कर रहे हे, क्या है वह रहस्य, तीन युग बीत जाने के बाद भी,जो आज तक छिपा हुआ है !
यह सुन श्री कृष्ण मुस्कुराए और कहा! हे ! मुनिवर, आपने सत्य ही कहा है ! किन्तु ? मैरो निज स्वरूप कछु और ही है ! “अनेकोनेक कल्पों से, “विश्वादी पंचनऋषि” “श्रीधाम वृन्दावन” धाम के, “अति दुर्लभ”- “अत्यन्त गोपनीय” *”नित्य विहार”* की प्राप्ति हेतु जन्म जन्मान्तर से अनन्तकाल की तत्पश्चर्या द्वारा एक ही लक्ष्य प्राप्ति हेतु लीन मग्न हैं।” यह सुन श्री नारद जी ने हाथ जोड़ कर विनती की, कि वह “अत्यन्त गोपनीय नित्य विहार” क्या है ? और इन महान तपस्वी ऋषियों को उसकी प्राप्ती कैसे होगी?
नारद जी को करूणामयी परोपकार भाव से ओतप्रोत देख भगवान “श्रीकृष्ण” बोले जब यह पंचनऋषि अपनी तपस्या का अभिमान पूर्णतया त्याग कर, दीनता पूर्वक भक्तिभाव को हदय में धारण कर, सदगुरू की शरण में आए और सतगुरू को ही नित्य विहार रूप जान कर ग्रहण करें तब मात्र ही इन विश्वादी पंचन ऋषियों को अपने अभिष्ट वस्तु की प्राप्ति हो सकती है।
श्री हरि की इच्छा से श्री कृष्ण और नारद जी के मध्य हुए इस वार्तालाप की भनक विश्वादी पंचन ऋषि के कानों में सुनाई पडी। यह सुन विश्वादी पंचन ऋषि चौंक उठे, और तुरंत व्याकुलता पूर्वक दीन भाव से श्री कृष्ण भगवान के श्री चरणों में आकर प्रणाम किया और विनती करी, कि हे प्रभू ! अखिल ब्राहमाण्ड के नायक सबके नियन्ता प्रभु आप ही है। हमने आपकी सारी वार्ता सुन ली है। आपने हमारे अंतकरण मे कई युगो से व्याकुल और प्यासी अखियों का सब सुख मूल नित्य विहार को दर्शन कराने वाले स्वामी आप ही है। अब हम सब आपकी ही शरण है। कृपया हमारी “जल बिन – तडपती मछली” जैसी विरह से व्याकुल अखियों को नित्य विहार दर्शन कराओ।
श्री कृष्ण बोले ऋषिजनों आप सत्य कह रहे है सब चराचर का नियन्ता मैं ही श्रीकृष्ण हूँ। अब तुम लोगों को अपनी अभीष्ठ अवश्य प्राप्त होगी। देखो! श्री ब्रह्मा के मानस पुत्र, श्री सनकादिक उनके शिष्य श्री नारद जी आपके सामने खड़े है। तुम सब इनकी शरण में आओं। क्योंकि बिना श्री गुरू कृपा के परम तत्व की प्राप्ति का होना, असम्भव है। आज्ञा पाते ही जय-जयकार करते हुए पंचऋषि श्री नारद जी के चरणों में साष्टांग दण्डवत कर, दीन भाव से हाथ जोडकर खड़े हो गये! तब नारद जी ने आश्वासन दिलाते हुए श्री निजगोपाल महामंत्र का अनुष्ठान करने की आज्ञा करी और कहा – इससे तुम्हारे सारे अभिमान और पूर्व संस्कार नष्ट हो जाएगे, और प्रेम रस भक्ति उदित होगी। तब मात्र ही निश्चित रूप से “नित्य विहार को प्रदान करने वाली प्रेम सहेली श्री ललिता जी के दर्शन होंगे”। तब निश्चित ही तुम्हे अपने अभिष्ठ की प्राप्ति हो जाएगी। विश्वादी पंचन ऋषि श्री निज गोपाल मंत्र का जाप करने में लीन मग्न हो गये, कुछ समय पश्चात विश्वादी पंचन ऋषि की अनेक कालों की तत्पश्चर्या, भक्तिभाव, प्रेमभाव, सच्ची लग्न और अटूट चीर अभिलाषा देख “श्री प्रेम सहेली श्री ललिता जी” साक्षात “अति दैदिप्यमान स्वरूप सहित अंगकुन्दन सो सरस मृदुल, लाल लहंगा, नील सारी, जुगल कंचुकी, सुन्दर दिव्य माला धारण किए रूनक-झुनक- झनकार करते हुए, परम देदीप्यमान सच्चिदानन्द, प्रेमरस स्वरूप में प्रकट हो गयी।
समस्त विश्वादी पंचन ऋषि की अखियाँ यह “दिव्य प्रकाश” देखकर चकाचौंध हो गयी। यह स्वरूप ऋषिगण नहीं देख पा रहे थे! तब “परम उदार शिरोमणि निजजन-भक्तवत्सला श्री ललिता जी” ने इन्हे “दिव्य दृष्टि” प्रदान की, ऋषिगण श्री ललिता सखी के अति दिव्य आलोकिक रूप को देखकर, मौन से स्तव्ध रह गये। कुछ बोल ही नहीं पाये।
तब श्री ललिता जी ने मधुर वाणी में कहाँ – ऋषिजनों वर मांगो, इतना कहने पर भी विश्वादी पंचन ऋषि कुछ बोल नहीं पाए। स्तव्ध से निरंतर खडे रहे। “मन ही मन एक ऋषि “वात्सल्य भाव”, एक ऋषि “दास भाव” और तीन ऋषि माधुर्य भाव की भावना से दर्शन करने लगे”।
“परम उदार – परम दयालू” श्री ललिता जी ने उनके मन स्थिति अनुसार उन्हे कहा संकोच मत करो! इच्छानुसार वर मांगों ! तब …
ऋषिगण कुछ बोले, “आपके परम दिव्यातीत स्वरूप में ही अचिन्तय श्रीधाम वृन्दावन और काम प्रेमरत श्री युगल के दर्शन हो रहे है”। यदि आप प्रसन्न हो तो यही वर मांगते है कि
“ऐसैं ही देखत रहे, तबही जनम कौं सुफल मानैं”।
“हमरो प्यारो मन मधुकर आपके पाद-पद्म-पराग कौं निरन्तर पान करतो रहै”।
श्री ललिता सखी बोली – धन्य-धन्य ऋषिजनो! एवमस्तु! ऐसैं ही होगा।
मैरा दिया हुआ “चूडामणि महामन्त्र – युगलमन्त्र” सेवन करो। ओर नित्य विहार की प्राप्ति के लिए, इस कलयुग में ऋषिगणों को एक जन्म ओर धारण करना पड़ेगा ! श्री वृन्दावन में ही आप ही लोगन के घर मैं अवतार धारण करूंगी।
“आप लोगन के भीतर जो अभी इस समय प्रेमभाव है, यह ही मेरी माता के रूप में प्रकट होएगों।” और “श्री गिर्राज जी सहित अन्न्यनि के मध्य में निरन्तर नित्य विहार को प्रकाश करूंगी!” सम्मान पूर्वक यह वरदान देकर श्री ललिता सखी जी अंतर्ध्यान हो गयी।
वरदानानुसार विश्वादी पंचन ऋषि श्रीपंचनऋषि – श्री गंगाधर जी, श्री गुरूजन जी, श्री जपना, श्री भगना, श्री भीलाजी के रूप में श्रीधाम वृन्दावन क्षेत्र के समीप में ही, राजपुर नाम के ग्राम में प्रकट हुए ।
समय की गति चलती रही और एक दिन समयानुसार “श्री गंगाधर जी का विवाह” साक्षात “प्रेम-प्रीति, भाव स्वरूपा श्री चित्रादेवी जी” से सम्पन्न हुआ।
वरदानानुसार “श्री चित्रा जी” से *श्री प्रेम सहेली युगल प्रिया ललिता सखी* स्वयं, **संवत् 1537 (1537) विं. की “भाद्रपद शुक्लाअष्टमी” “बुधवार मध्यान्हः” में वृन्दावन के समीप :राजपुर: में, अशेष रसिक चक्रचूणामणि श्रीहरिदास के रूप में ” श्री ललिता सखी स्वंय प्रकट हो गई..।
“मुन्यग्निशरभूदहने 1537 अब्देवैक्रमेसितेदले।
भाद्रे मसे बुधेऽष्टम्याभावि र्भूतो धरातले।।”
आपके प्राकटय का समाचार पाते ही स्वामी आसुधीर देवजू महाराज ने, भवन में पधार कर नवजात शिशु के हेतु – कण्ठी पट-आदि, प्रसाद माता चित्रा को प्रदान किये ! माता चित्रा ने शिशु को श्री गुरू चरणों में समर्पित कर दिया। श्री गुरू आसुधीरदेव जी ने साक्षात अवतरित श्री ललिता सखी जी को श्री हरिदास के दिव्य स्वरुप में स्वीकार कर, पालन पोषण हेतु पुनः श्री चित्रा जी की गोद में दे दिये। प्राकट्य होते ही सम्पूर्ण “श्रीधाम वृन्दावन” “लता-पता” मिल “बधाई – उत्सव” ऐसे हुए जैसे गंगा-यमुना जी ने संगम रूप धारण कर लिया हो। समस्त – संत महाजन, नगर के नर-नारी, विविध प्रकार की भेट, बधाईयाँ ले ले कर, श्री चित्रा जी द्वारा चित्रित प्रेमभाव, अनुरागरूप सरस्वती में, आनन्द का गोता लगाने लगे।
श्री गंगाधर जी गुरूजन, – जपना, -भगना, भीला, श्री विठल समस्त पंचन ऋषि,**””श्रीहरिदास**”” जी के रूप माधुर्य भरी लीलाओं को निरख-निरख, चित्त में अति प्रेमानन्द अनुभूति द्वारा, अति आनंदित हो उठे।
एक पल के लिए छाया शरीर से अलग नहीं हो सकती, विश्वादि पंचन ऋषि इस जीवन में ऐसे ही संग रहते, श्री हरिदास जी को,एक पल अलग नहीं छोड़ते।
“ग्यारह वर्ष की उम्र में “विरक्ति” और “पच्चीस वर्ष की उम्र में” “श्रीराधा अष्टमी के दिन” गुरूवर श्री आसधीर देवजी महाराज ने, श्री स्वामिनी जी को, अभिषेक कर यज्ञयोपवित संस्कार और मंत्र प्रदान किया।
“श्री स्वामी हरिदास” जी महाराज अनादी – सिद्ध सबउपाधि से रहित, सबके मध्य परम आचार्य के रूप में प्रकट हुए, परन्तु कोई इनके भेद को समझ नहीं पाया।
तब से श्री स्वामी हरिदास जी निधिवन को छोडकर, अन्यत्र कहीं नहीं गये। विक्रम “संवत 1567 दिन मार्गशीर्ष शुक्ला पंचमी” के दिन “श्री स्वामी हरिदास जी महाराज” अतिदिव्य – निज – रंगमहल में श्री ठाकुर जी के संग,अत्यन्त गूहृ गुढ़ गोपनीय भावना में लीनमग्न थे।
उसी समय श्री बाँके बिहारीजी भाव मगन, करूणा निदान – श्री स्वामी जी का श्रीमुख निहार, “श्री बाँके बिहारी जी बोले – स्वामी जी” मैरे मन में एक बात का विचार दिन-रात उमडता रहता है, मैं आपसे कहना तो चाहता हूँ पर ? संकोच वश कह नहीं पाता हूँ, आप यदि आज्ञा करो तो कहूँ।

श्री बाँके बिहारी जी की ऐसी मधुर वाणी सुन मानो रस, सुख, प्रीति, करूणा और कृपा का समुन्द्र उमर पड़ा। श्री स्वामी जी प्रेम रस में सरावोर हो बोले – रसिक रसाल तीन लोक के स्वामी समस्त चराचर सृष्टि के एक मात्र नियन्ता प्रभु आप संकोच छोड़ जो कहना चाहे आज्ञा करें।
रसिकवर श्री स्वामी हरिदास जी महाराज के मुखारविन्द की अमृतमयी वाणी सुन श्री बाँके बिहारी जी बोले – वेसे तो हमारे हदय में अनन्त अभिलाषाएँ उठती ही रहती है और उनको आप हर एक पल पूरा करते रहते हो। आप पर तो मैं बलिहारी जाऊ, और एक मनोरथ और अभिलाषा यह है कि हम युगल चन्द्र जगत में उदित हो जाए तो त्रय-ताप से तपित जगत के प्राणि शीतलता की प्राप्ती कर सकेंगे।
यह सुनते ही श्रीस्वामी हरिदास जी महाराज परम प्रसन्नता से बोले हे बिहारीलाल! आपका विचार अति उत्तम है, इसी में जगत के प्राणी का हित है, आप दोनो सुकुमार, दिव्य वृन्दावन के नवल महल में अनन्त अनंगरंग रस सागर में डूबते और तारते रहे हो।
यहाँ के आनन्द का कोई अंत नहीं है, अति प्रवीण सखीजन ही आपके लाड-चाव (देख-रेख) में रहे है। आगम, निगम पुराण और बड़े-बड़े तत्वज्ञानी की कोई कमी नहीं है,किन्तु विचार करने की बात यह है कि ऐसी स्थिति में कुटिल, कुबुद्धि, तार्किक लोग भी आवेगे और प्रणाम करेंगे। इसलिए है इच्छाअवतारी परम रसिक श्याम सुजान आप अकेले ही दर्शन देते रहो। प्रियाजी की गद्दी जी की ही सेवा रहेगी। ज्ञानी, योगी, यति, भक्त एवं अन्य उपासकगण आपको अपनी-अपनी भावना के अनुसार दर्शन करेंगे और आनन्द मग्न हो शीतलता प्राप्त करेंगे। यह संवाद होते ही जैसे ही श्री स्वामी हरिदास जी महाराज ने ध्यान से बहार आकर देखा तो वर्तमान में श्री विठल विपुल देव जी के संग और अनेक शिष्य हाथ जोडे नमन कर सामने खडे थे, उन्हे सामने देख श्री स्वामी जी समझ गये कि श्री बिहारी जी प्राकट्य होकर ही रहेंगे। श्री स्वामी जी को नमन कर श्री विठल विपुल देव जी बोले श्री स्वामी जी महाराज कई दिनों से मन में एक अति तीव्र प्रश्न था आज पूछने की अनुमति चाहते है। परम उदार रसिक कृपाल श्री हरिदास जी महाराज मुसकुराएँ और विठल विपुल देव जी को एक छोटा से बिरव दिखा दिया और कहा कि इसमें प्रवेश कर जाओ। आज्ञा पाते ही श्री विठल विपुल देव जी बिवर में प्रवेश कर गये। अनन्त श्री युगल को एक श्रीविग्रह स्वरूप में देखा प्रियाजी के अति उज्जवल प्रकाशमान दिव्यस्वरूप को श्री स्वामी जी बिना कोई नहीं देख सके। भावना के अनुसार उसी स्वरूप में अपने भावना नयन से दर्शन किये। श्री विठल विपुल देव जी परमानन्दित हो वही स्वरूप इच्छा विग्रह श्री बिहारी जी को गोद में ले बाहर आए। दशो दिशाओं में जय-जयकार की ध्वनि छा गयी। उस दिन मार्ग शीर्ष सम्वत् 1567 था। अगहन शुक्ला पंचमी के दिन शुभ सुन्दर मूर्ति स्वरूप श्री बिहारी जी प्रकट भये। रसिक वर श्री हरिराम व्यास जी ने पूछी – स्वमी जी आपके प्राण जीवन लाल का शुभ नाम क्या है? मधुर मुस्कान के साथ मुख कमल से कहा :- ” बांके बिहारी ” तो कोई महानुभव बोले “श्री बांके बिहारी” जी की प्राण प्रतिष्ठा कब होएगी? तब श्री स्वामी जी का ईशारा पाकर “श्री विठल विपुल देव ” जी ने इत्र का फोहा लेकर “श्री बिहारी जी” के भुज दण्ड पर दख दिया। “श्री बाँके बिहारी जी ने मंद मधुर मुस्कान भरे नासिका के श्वास से फुहा उड़ा दिया। यह दर्शन कर समस्त जगत के संशय दूर हो गये और समझ गये कि यह स्वयं साक्षात ही श्री बाँके बिहारी जी है। बदन चन्द्र निरख कर रसिक कुमुदावली प्रफुल्लित होकर बधाई गाने लगी। श्री बिहारी जी की नित्य प्रति निधिवन राज में पूजा होने लगी। एक दिन उनके सातवे आचार्य के शिष्य जगन्नाथ के बिनती करने पर कि श्री बाँके बिहारी जी मुझे दे दो, मेरा कुल परिवार इनके आशीर्वाद से चलता रहेगा। अति करुणामयी स्वामी श्री की कृपा से बाँके बिहारी जी को सेवा पूजा के लिए उनके शिष्य जगन्नाथ ले गए, तब से बाँके बिहारी जी निधिवन से जाकर बाँके बिहारी मंदिर में सेवा पूजा के लिए चले गए। (यह बात और है कि आज बढ़ते कलयुग के प्रभाव के चपेट में आकर “कुछ लोग दक्षिणा और चड़ावे की मांग और मिथ्या प्रचार करते है जो कि लोक और परलोक दोनो में प्रतिबन्धित हैं। भक्त जन अपने विवेकानुसार सावधान रहे)।
कुछ समय पश्चात ……………….
निधिवन से बाँके बिहारी जी के जाने के बाद…”श्री ललित किशोर जी महाराज” यमुना किनारे रज की गद्दी बना कर , अपनी रस भक्ति में लीन हो गये। कुछ ही समय में वृन्दावन वासियों ने देखा कि श्री स्वामी ललित किशोर जी महाराज जिस अश्वत्थ (पीपल)वृक्ष के नीचे बैठे थे वह पूर्णतः सूख चुका था और कब गिर जाए ऐसी स्थिति में था। श्री स्वामी ललित किशोर जी की रस भक्ति के प्रभाव से अश्वत्थ स्वतः ही हरा भरा हो गया, जो कि आज भी विद्यमान है। कुछ समय बााद ग्रामवासियों ने जंगली जानवरों से रक्षा करने के लिए इस स्थान पर वास की टटिया लगा दी जिस कारण इस स्थल का नाम श्री टटिया स्थान पड़ा। तब से यहाँ वही वर्षो पुरानी प्राचीन परम्परा चली आ रही है। श्री स्वामी हरिदास जी महाराज के जन्म स्थान और कई प्रकार की मिथ्या भ्रान्तियाँ फैली हुयी है। यहाँ श्री स्वामी हरिदास जी महाराज की प्राचीन धरोहर आज भी श्री टटिया स्थान द्वारा सरंक्षित और सुरक्षित है। समस्त संत अपनी अपनी कुटियाओं में रह कर भजन कीर्तन करते है। यहाँ आधुनिकता और पाश्च्यात संस्कृति का कोई प्रवेश नहीं है। यहाँ समस्त बहिन बेटियां सिर ढंककर ही अंदर प्रवेश कर सकती है। यहाँ आज भी समस्त प्राचीन परम्परा चली आ रही है। श्री मोहनी बिहारी जी के दरबार में आज भी लाइट व इलेक्ट्रोनिक उपकरणों का उपयोग सर्वथा वर्जित है। यहा पर मांगने की परंपरा नहीं है। न ही कोई भेट पात्र है, न ही यहा का कोई संत कही बाहर गाने बजाने जाता है, न ही यहा कोई व्यावाहरिक लेन-देन की अनुमति नहीं है।